Dhurandhar Film Shooting: फिल्म ‘धुरंधर’ की शूटिंग किसी फिल्म स्टूडियो तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे भारत के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में असली लोकेशन्स के साथ फिल्माया गया है। इन्हीं असली लोकेशन्स की वजह से फिल्म हर सीन में ज्यादा रियल और दमदार महसूस होती है। आइए जानते हैं कि ‘धुरंधर’ की शूटिंग किन-किन जगहों पर हुई है।
निर्देशक आदित्य धर की लेटेस्ट फिल्म ‘धुरंधर’ इन दिनों सिनेमाघरों में दर्शकों का जबरदस्त ध्यान खींच रही है। इसके साथ ही धुरंधर फिल्म की शूटिंग लोकेशन्स भी दर्शकों के बीच खास चर्चा का विषय बन गई हैं और फिल्म को लेकर लोगों की उत्सुकता और बढ़ा रही हैं। फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि पाकिस्तान के गैंगवार से जुड़ी हुई दिखाई जाती है, जिसमें कराची और लयरी जैसे इलाकों का माहौल पर्दे पर उभरकर आता है। इन्हीं सीनों को देखकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई कि क्या वाकई रणवीर सिंह स्टारर ‘धुरंधर’ की शूटिंग पाकिस्तान में की गई है, या फिर इसके पीछे कोई और सच्चाई छिपी है।
फिल्म ‘धुरंधर’ में दिखाया गया पाकिस्तान असल में पाकिस्तान नहीं है। कहानी को ज्यादा वास्तविक बनाने के लिए मेकर्स ने पंजाब के एक गांव में खास तौर पर सेट तैयार किया, जिसे पाकिस्तान के इलाकों जैसा रूप दिया गया। गांव की गलियां, गांव का माहौल और लोकेशन की बनावट इतनी सटीक थी कि पर्दे पर यह जगह पूरी तरह पाकिस्तान जैसी महसूस होती है।
फिल्म ‘धुरंधर’ की टीम को कहानी के लिए ऐसे लोकेशन की तलाश थी, जो पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों जैसा बिल्कुल असली लगे। भारत का पंजाब और पाकिस्तान का पंजाब—दोनों की जमीन, खेत-खलिहान और लोगों की जीवनशैली में काफी समानता है। मेकर्स ने इसी समानता को समझदारी से इस्तेमाल किया और पंजाब को ही कहानी की जरूरत के मुताबिक ढाल दिया, जिससे हर सीन पर्दे पर बेहद रियल महसूस होता है।

नीचे जानिए 6 लोकेशंस, जहां इस स्पाई थ्रिलर की शूटिंग हुई है।
बैंकॉक
‘धुरंधर’ की शूटिंग की शुरुआत 25 जुलाई 2024 को बैंकॉक से हुई थी। यहां सिर्फ कुछ सड़कों को नहीं, बल्कि पूरे के पूरे इलाकों को कराची के लयारी जैसा लुक देने के लिए तैयार किया गया। तंग गलियां, नाइट शूट और सुरक्षा के चलते सील की गई सड़कें—थाईलैंड प्रशासन से मिली इजाजत के कारण यह सब संभव हो पाया। पर्दे पर ये सीन इतने रियल लगते हैं कि कई बार ऐसा महसूस होता है जैसे फिल्म वाकई पाकिस्तान में ही शूट की गई हो।
अमृतसर
नवंबर 2024 में फिल्म की यूनिट अमृतसर पहुंची, जहां गोल्डन टेंपल के आसपास के इलाकों में अहम सीन फिल्माए गए। त्योहारों का मौसम होने की वजह से यहां काफी भीड़ थी, जिसे संभालना यूनिट के लिए आसान नहीं था। शूटिंग को सुचारु रूप से पूरा करने के लिए कुछ रास्तों को अस्थायी तौर पर डायवर्ट करना पड़ा। फिल्म में अमृतसर के ये हिस्से कहानी को एक शांत, भावनात्मक और सुकून भरा रंग देते नजर आते हैं।
लुधियाना
सबसे अलग और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा शूट लुधियाना के खेड़ा गांव में हुआ। कुछ ही घंटों के भीतर पूरे गांव का रंग-रूप बदल दिया गया—साइनबोर्ड्स, दीवारों के रंग, झंडे और माहौल, सब कुछ पाकिस्तान के ग्रामीण इलाके जैसा बना दिया गया। करीब तीन से चार दिन तक यहां लगातार शूटिंग चली और इन सीनों ने फिल्म में तनाव और रियलिज्म दोनों को और गहराई दी।
लेह-लद्दाख
लेह-लद्दाख में शूटिंग करना टीम के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं था। ऊंचाई और मौसम की कठोरता ने क्रू को पूरी तरह चुनौती दी। करीब सौ से ज्यादा लोग खाने और ऑक्सीजन से जुड़ी दिक्कतों के कारण बीमार पड़ गए, जिसके चलते शूटिंग कुछ समय के लिए रोकनी भी पड़ी। इन मुश्किल हालातों में एक्टर अक्षय खन्ना को कम ऑक्सीजन वाले माहौल में एक्शन सीन करने के लिए पोर्टेबल ऑक्सीजन के साथ रिहर्सल करनी पड़ी। हालांकि, मेहनत का नतीजा स्क्रीन पर साफ दिखता है—ऊंचे पहाड़, सूनी घाटियां और एक ऐसा माहौल, जो खुद ही खतरे का एहसास करा देता है।
फिल्मिस्तान स्टूडियोज
फरवरी 2025 तक ‘धुरंधर’ की टीम मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियोज पहुंच गई थी। साल 1943 में बने इस ऐतिहासिक स्टूडियो को कभी हिंदी सिनेमा का बड़ा केंद्र माना जाता था, जहां कई यादगार फिल्मों ने आकार लिया। इस लोकेशन पर शूट किए गए सीन कहानी को जरूरी कंट्रोल्ड माहौल देते हैं, जहां तकनीक और परफॉर्मेंस पर पूरी तरह फोकस किया जा सका।

मुंबई
फिल्म के बड़े एक्शन सीक्वेंस और तेज़ रफ्तार कार चेज़ मुंबई के मढ़ आइलैंड में शूट किए गए। शहर के इतना करीब होने के बावजूद यह इलाका अपने आप में थोड़ा अलग और ऑफ-ग्रिड सा महसूस होता है। यहीं पर कहानी के कई अहम ट्रांजिशन सीन फिल्माए गए, जहां प्लानिंग, सस्पेंस और एक्शन एक साथ आगे बढ़ते हैं।
‘धुरंधर’ किसी स्टूडियो की चारदीवारी में बनने वाली फिल्म नहीं थी। मेकर्स ने असली लोकेशन्स पर जाकर मौसम, भीड़ और हर तरह की चुनौतियों का सामना किया, ताकि कहानी पर्दे पर सच्ची लगे। शायद यही वजह है कि फिल्म का हर फ्रेम जमी हुई तस्वीर जैसा महसूस होता है—मानो दर्शक सिर्फ देख नहीं रहे, बल्कि उन जगहों को खुद जी रहे हों।






